Friday, April 27, 2012

मेरी टिप्पणी


अपना घर खुद फूँक कर, चला चाँद की ओर
मंगल-जीवन ढूँढ्ता , क्यों दिल मांगे 'मोर'
क्यों दिल मांगे 'मोर',कौन सी यहाँ कमी है
पंच-तत्व उपलब्ध , यहीं पर  धूप-नमी है.
यहीं  बसा ले  स्वर्ग , यहीं पूरा कर सपना
चला चाँद की ओर, फूँक कर घर खुद अपना !

-अरुण कुमार निगम

आपका लिंक:
मंगल भवन अमंगल हारी
आदरणीय वीरु भाई
http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/04/blog-post_28.html