Friday, April 27, 2012

मेरी टिप्पणी


अपना घर खुद फूँक कर, चला चाँद की ओर
मंगल-जीवन ढूँढ्ता , क्यों दिल मांगे 'मोर'
क्यों दिल मांगे 'मोर',कौन सी यहाँ कमी है
पंच-तत्व उपलब्ध , यहीं पर  धूप-नमी है.
यहीं  बसा ले  स्वर्ग , यहीं पूरा कर सपना
चला चाँद की ओर, फूँक कर घर खुद अपना !

-अरुण कुमार निगम

आपका लिंक:
मंगल भवन अमंगल हारी
आदरणीय वीरु भाई
http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/04/blog-post_28.html

14 comments:

  1. सुन्दर काव्य रूप अणु -टिपण्णी के रूप में .आभार .. ....कृपया यहाँ भी पधारें -http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/05/blog-post_7883.html./http://veerubhai1947.blogspot.in/
    शनिवार, 5 मई 2012
    चिकित्सा में विकल्प की आधारभूत आवश्यकता : भाग - १


    स्कूल में चरस और गांजा ,भुगतोगे भाई, खामियाजा

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  2. बिल्कुल सही कहा आपने पहले जो है उस को सुधार लो बाद में आगे बढ़ने कि बात सोचो सार्थक सोच बहुत सुन्दर |

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  4. निगम जी
    अच्छा व्यंग्य ....

    काश कि लोग इसे समझ सकते

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  5. Beautiful post....arun ji :)

    http://apparitionofmine.blogspot.in/

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  6. बहुत सही बात कही है आप ने अरुण जी..........

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  7. दुनिया चाहे जितनी भी सुंदर हो मेरी माँ से ज्यादा सुंदर नहीं हो सकती ।

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  8. दुनिया चाहे जितनी भी सुंदर हो मेरी माँ से ज्यादा सुंदर नहीं हो सकती ।

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  9. दुनिया चाहे जितनी भी सुंदर हो मेरी माँ से ज्यादा सुंदर नहीं हो सकती ।

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